• “मोक्ष और मुक्ति”

    ना चाहिए मुझे तुमसे अब ,मोक्ष !और ना चाहिए तुमसे कोई मुक्ति!देना ही है तुम्हे तो दे दो ऐसी भक्ति,अपने चरणों की कृष्ण तुम आसक्ति! किसी और को अब नही है पाना,सारी चेतना तुम में समाहृत जाना!बिनती एक,जब भी बुुलाऊआना,तुमसे ना है मुझे कुछ और मांगना! हर उपलब्धी है तुम में ही समाई,गवांयां है मैने…

  • “श्रावणी रास “

    रास रचाने गोपी संग,आकाश विशाल पर छाये! सुन कर रुक गई हवा, कृष्ण जो अपनी बंसी बजाये, श्यामल रंग भर गई फिजा,पुनः वृंदावन रास रचाये! हर एक घटा संग नाचे माधव,सबका मन भरमाये, धन्य हुईं सब बालायें,केशव जब लगे उन्हें नचाने ! लगी बरसने मधु-चांदनी, नव धारा अमृत की बहने, खिली पुष्प कलियां सतरंगी, रात…

  • अहंकार

    अहंकार आत्म हनन कर उगता चित्त में जो विचार ,पंच तत्व काया समझता मानव जीवन-सार,विस्मृृत चेतना कर जब जीवन उलझता माया जाल,बन्धन से तब बांध लेता अहंकार का काल! शमा सिन्हा30 -6 -23

  • “मौन”

    मौन में होता है सन्निहित उत्तर, उठते हर प्रश्नका! जीवन की सभी परिस्थिति,हर तूफान का! छिपि है इसमें शक्ति अपरिमित ,तेज धैर्य का! बोल से ज्यादा अभिव्यक्ति,शौर्य सहनशीलता का! मौन सूचक है, अंतरनमन स्वाभिमान की पराकाष्ठा का! है प्रकाश-ध्वजा अजय यह,आकाश से ऊँचा मनोबल का! शब्द हीन होकर भी विस्मित अभिव्यक्ति है यह स्वमत का!…

  • कृष्ण का विरह

    “कृष्ण का विरह” दिखाए नही जग को कृष्ण ने अपने हृदय के घाव, अबोध उम्र मे छूटे ग्वाल-बाल, ममता भरी छांव,! कर्म – बन्धन में बांध रोक लिया लल्ला नेआंसू अपने, पर मन में बसा कर चल दिए ,यमुना-बालसखा के सपने! पीछे छूटा यमुना तट, विशाल कदम्ब की छैया सूनी, ब्रम्ह होकर भी ना रोक…

  • योग अभ्यास

    अज्ञात का ज्ञान है योगआत्मा से पहचान का संजोग,निरंंतरअभ्यास से कर प्रयोग,अंतर्दृष्टि का नित होता नियोग। अंगों का बनता ऐसा समीकरणशरीर सेआत्मा का दिखता व्याकरण !होता शक्तिशाली जितना आत्म बल।क्षिण होता उतना ही माया का छल। इच्छायें पल पल होती जाती क्षिणविलग तन से आत्म ज्ञान ,बनते जैसे जल और मीन ।मिट जाता क्लेश, पल…