• “परछाई”

    कहता जग,दिया नारी को उसने ही संंरक्षित जीवन है! समझाए कोई निष्कर्ष उनका, हर तरह अस्वीकार्य है! भूल गया कृतघ्न!वह कैसे,अपने नौ महीने गर्भ काल के? क्या श्वास चल सकतीं पुरुष की स्वतंत्र,बिना उसकी ढाल के? जिसने लाया संसार में, महिमा उस जन्म धात्री की है! सूरज -चांद -सितारे,सबकी कल्पना,वही तो देती है! अंधेरे मे…

  • “सूर्य “

    यूं लगा द्वार का,जैसे किसी ने कुण्डा खटखटाया! प्रातः कालीन बेला में, हो रही थी रात्री शरमा कर विदा। दबे पांव से चल कर मैंने, “कौन है?”पवन से पूछा। “शांंती ,चारो दिशा है छाई!”बोली मुझसे खामोश हवा! “मिलने तुम से आया है कौन,जरा देखो पूर्व की ओर!” नव दिवस का आनंंद मनाओ, बाग मचा रहे…

  • “जिंदगी की शाम “

    दिखने लगे बदलाव अनेेक जब समय के रफ्तार संग! हो रहा है जवां-गुरूर का, नशा अचानक ही भंग! पूछा मैनें ,” यह परिवर्तन मुझे क्या बताना चाह रहा?” उपचार, झुर्रियां मिटाते नही,चेेहरा बेनूर क्यों हो रहा?” गूंजी बिंदास खिलखिलाहट, वह मुझपर ही हंस रही थी! सिर पर हाथ रख वह,बेबाक मेरी तरफ देख रही थी!…

  • मन को कैसे समझाऊं

    यह मन रुकता नही क्यों कभी

  • “समझदारी”

    जब सब बोल रहे हो तो वह चुप रहने को है कहती। हो रहा हो जब अन्याय तो, शांंति फैलाने आ जाती! अनुजों को धैर्य दे, समझा कर है बस में कर लेती! कभी हक के लिए उठती आवाज में है समा जाती! अग्रज के चरणों में सेवा सदा अर्पण है यह करती , बड़े…

  • ससुराल की सैर

    “ससुराल की सैर” नई दुल्हन आई थी नये घर,नया हुआ था ब्याह! मन ना लगता,याद आता नैहर,चेहरा हुआ था स्याह! मोहिनी सी सूरत बनाया उसने,मेकअप सारे हटा कर, “आज अम्मा के घर जाऊंगी!”, कहने लगी रो रोकर । बन्ना अलहड़ जवान,प्रतिदिन करता दण्ड -बैठक मस्त! खाने का बड़ा वह शौकीन और पचाने मे था बहुत…