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भगवान विष्णू
दिया यह अस्तित्व मुझे तुमने स्वीकारा तुम्हे पिता है हमने! दौड़ रहा जो लहू है जग में, कण कण है अनुग्रहीत तुमसे! चकित हूं देख तुम्हारी महारथी! स्वतः कैसे सारी क्रियायें हैं होतीं! आंख चहूं ओर सहज है देखतीं पलक झपकते तंत्र सूचना देती! पानी पीना है या भूख है लगी! अंग करते पूर्ण इच्छायें…
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बसंत
शीथिल हो रही प्रकृति को किसने है जगाया? गम्भीर मन उसका किसने चंचलता से नहलाया? धरा सुप्त पड़ी थीं अभी , किसने उसको बहकाया? चुनरीओढ़ा झीनी-पीली, पायल किसने है पहनाया! वह कौन शुक-सवार है जो पांच बाण लेेकर आया? बना कर हर कोना रंगीन,खेतों में भी फूल सजाया? समीर ने पी लिया मधुरस कोई,इत-उत है फिरता…
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होली
मोर ने वन में पीया पिया मधुर रट है लगाई प्रेम रंग अपटन चढ़ा मोरनी होली खेलन आई! कर रहे बाग-भौरे गुंजार,हवा में बज रही शहनाई ! खुशबू ने घोला भंग तुलसी में,बेणु ने है सबकोपिलाई ! चकोर से पूछा चांद ने”क्यों तूनेऐसी हालत बनाई ? देख मुझे हो रहे मदहोश,जैैसे रांंझा ने हीर हो…
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“निदान की उलझन”
जाने क्यों पुनः घूम कर आ जाती है समस्या पूर्णिमा के बाद जैसे आती है अमावस्या! लगता है एक क्रम में सजा हैं सारा विधान जिसमें निश्चित है उतार चढ़ाव का परिमाण। जहां एक खत्म होता है वही से होता प्रारंभ, नाचता है जीवन सदा लिए हुए अपना दंभ! पाकर सुख कैसे संघर्ष की यादें…
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जलेबी और समोसे की सगाई
हो रहा था बसन्तआगमन शुुक सवार कामदेव का! खिले अनेक थे फूूल,चख रहा था रस मधुकर मधु का! गुजरा तभीआकाश से,पुुष्पाच्छादित कामदेव रथ था। कलकत्ता गलियों में छन रहा था गर्मा गर्म समोसा! हवा ने की ठिठोली, लेकर खुशबू ढेरआचल में समेट, ठुुमकती लहराती वह पहुंची, कामदेव को करने भेंट! “वह क्या बन रहा है,रथी?”पूछा…
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जो हो नही सकता वही तो करना है!
मन लगाता आकाश परे छलांग ले लेते हैं सपने रूप सांगोपांग ! लालच के जाल में जीव तैरता रहता, भोगी बना,योगी का स्वांग है रचता! धरा पर वह स्वर्ग उतारना चाहता मृग बना मरीचिका सदा है खोजता! समेटकर अथाह ,वह रहता है प्यासा! अपनी युक्ति से खुद को देता है झासा! इस शरीर से वह…